पुस्तकों-ग्रंथों, शिलालेखों और चित्रों/पेंटिंग्स से आधुनिक होली का इतिहास
• 300 ईसा पूर्व का शिलालेख जो रामगढ, विंध्या प्रांत से प्राप्त हुआ हैं उसमें भी होलिका उत्सव का उल्लेख हैं.
• 7वीं शताब्दी के राजा हर्षा अपनी पुस्तक 'रतनावली' में होलिका उत्सव का जिक्र करते हैं.
• 1548 ई में जन्में श्री कृष्ण के परम भक्त रसखान अपनी रचनाओं में फूलों से बने रंगों और गुलाब वाले जल से होली खेलने का जिक्र करते हैं.
• 16वीं शताब्दी की अहमदनगर स्थित पेंटिंग में वसंत रागिनी के सार को दर्शाया गया है, जिसमें शाही जोड़े और कुछ अन्य युवतियों को जीवंत रंगों के बीच संगीत का आनंद लेते हुए दिखाया गया हैं.
• 1755 की एक मेवाड़ पेंटिंग में महाराणा और उनके दरबारियों को उत्सव के भाव में दिखाया गया है, जिसमें उड़ता रंग गुलाल रंगीन वातावरण को ओर महका देता हैं.
• बूंदी की लघु पेंटिंग में एक राजा को हाथी पर बैठा दिखाया गया है, जिस पर ऊपर की बालकनी से रंग बरसाए जा रहा हैं.
• हम्पी के एक मंदिर से प्राप्त 16वीं शताब्दी के एक चित्र में रंगीन पानी में भीगे एक शाही जोड़े को आनंदमय होली खेलते दर्शाया गया है.
पुराणिक कथाएँ और होली का प्राचीन इतिहास
भक्त प्रह्लाद, हिरण्यकश्यप और होलिका -
श्रीमद भगवतम के अनुसार, ऋषि कश्यप और दिति का पुत्र हिरण्यकश्यप जो स्वभाव से ही विष्णु का घोर विरोधी था और इच्छा रखता की प्रजा उसकी पूजा करें. हिरण्यकश्यप की पत्नी कयाधु एक बालक को जन्म देती हैं जिसका नाम प्रह्लाद रखा जाता हैं. प्रहलाद बहुत छोटे से ही भगवान विष्णु के परम भक्त होते हैं.
हिरण्यकश्यप एक दिन बालक प्रह्लाद से पूछता हैं “ जीवन में सबसे अच्छा कार्य क्या है”?बाल प्रह्लाद इसका उत्तर देते हैं “ संसार का त्याग कर श्रीविष्णु की शरण लेना”. इससे क्रोधित हो हिरण्यकश्यप, बालक प्रह्लाद को आश्रम भेज देता हैं. जब कुछ समय बाद भक्त प्रह्लाद आश्रम से लौटते हैं, तो हिरण्यकश्यप फिर उनसे यही प्रश्न करता है जिसका उत्तर बालक प्रह्लाद फिर वही देते हैं. इससे अति क्रोध आवेश में आकर हिरण्यकश्यप, अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने का आदेश देता है.
ध्यान करते प्रह्लाद पर सनिकों द्वारा अस्त्रों से वार किया जाता है, विषेले सापों से कटवाया, हाथी से कुचलवाया जाता है, चट्टानों से नीचे गिराया जाता है पर भक्त प्रह्लाद को कुछ नहीं होता. अंत में हिरण्यकश्यप अपनी बहन होलिका से मदद मांगता है, जिसके पास वरदान था “ शाल पहन वो बिना जले आग का सामना कर सकेगी ”. प्रह्लाद को मारने के लिए होलिका के साथ आग में बैठाया जाता है, आग पकड़ते ही होलिका की शाल हवा में उड़ प्रह्लाद के शरीर पर आ जाती हैं जिससे होलिका जलकर मर जाती है और भगवान श्रीविष्णु के भक्त प्रह्लाद का बाल भी बाका नहीं होता. हर साल इसी कथा को प्रतीक के रूप में होलिका दहन होता हैं.
भगवान शिव और कामदेव की कथा -
माता पार्वती भगवान शिव से विवाह करने
को आतुर थी पर शिव तप में मगन रहते थे जिस कारण उनका ध्यान माता नहीं गया. कामदेव को जब माता पार्वती के इस इच्छा
बारें में पता चलता हैं तो वो भगवान शिव को मारने के लिए हमला करता हैं. जिससे
भगवान शिव की तपस्या टूट जाती हैं, भगवान शिव अति क्रोध में कामदेव का वध कर देते हैं.
इसी दिन आज होलिका दहन के रूप में मनाया हैं.
अगले दिन कामदेव की पत्नी रति भगवान शिव
के पास आकर रोने लगती हैं और अपने पति को पुनः जीवन देने के लिए विनती करती हैं.
भगवान शिव उनकी प्राथना को स्वीकार कर कामदेव को दुबारा जीवित कर देते हैं. मान्यता
के अनुसार, इसी दिन को आज रंग भरी होली यानि धुलंडी के रूप मनाया जाता हैं.
ब्रज की होली परंपरा / राधा कृष्ण होली -
आशा है आपको यह होली की उत्त्पत्ति और इतिहास पर अच्छी तरह से शोध किया गया आर्टिकल पसंद आयेगा. मेरी तरफ से आपको और आपके परिवार को होली की शुभकामनाएं, खूब पानी और रंग गुलाल के साथ होली मनाए साथ ही लोगों को होली के इतिहास से भी जोड़ें 🙏

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