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बुधवार, 2 अप्रैल 2025

बांके बिहारी मंदिर का इतिहास, रहस्यमयी मूर्ति और दर्शन का समय

श्री वृंदावन धाम ब्रज में प्रवेश मात्र से जीव के जन्मों जन्मों के दुखों-पापों शमन होता हैं साथ ही जीव को परमानन्द की अनुभूति होती हैं। शायद ही ऐसा कोई भक्त हो जो वृंदावन जाए और बांके बिहारी को मनमोहन छवि को निहारे बिना वृंदावन से अपने गंतव्य को लौट जाए। बांके बिहारी का राधा -कृष्ण का संयुक्त रूप हैं, जो अपने आप में ठाकुरजी की प्रतिमा को अनूठा बनता हैं। बिहारी जी का विगृह काले रंग का जिसमें उनकी बड़ी बड़ी ऑंखें भक्तों को अपनी ओर खींचते हैं। मूर्ति में राधा-कृष्ण युगल स्वरूप में टेढ़े खड़े हैं फलस्वरूप विगृह को बांके बिहारी के नाम से जाने जाना लगा। ब्रज भाषा में टेढ़े को बांका कहा जाता हैं। 

बांके बिहारी मूर्ति का प्राकट्य का रहस्य  

स्वामी हरिदास जी की निधिवन में साधना और बांके बिहारी का विगृह 

बांके बिहारी जी की मूर्ति प्रकट करने का श्रेय संत शिरोमणि हरिदास जी महाराज को दिया जाता हैं। संत हरिदास का जन्म 1478 ईस्वी में माता गंगादेवी पिता आशुधीर के घर हरिदासपुर, हरिगढ़ में हुआ था। हरिदासपुर ग्राम आज के अलीगढ जिले में स्थित हैं जो वृंदावन मथुरा से काफ़ी निकटता पर हैं। हरिदास जी ध्रुपद शैली (शास्त्रीय संगीत की प्राचीनतम शैली) में अपने प्रिया प्रीतम राधा कृष्ण के लिए भाव लिखते और गाते थे। स्वामी हरिदास को तानसेन का संगीत गुरु भी माना जाता हैं।



स्वामी हरिदास भक्ति साधना करने के लिए हरिदासपुर छोड़कर वृंदावन आते हैं। वर्तमान, निधिवन को स्वामीजी अपनी तपोभूमि बनाते हैं जहाँ वह नित राधा रानी और भगवान कृष्ण के लिए अपने भाव गाते थे। स्वामीजी की भक्ति से प्रसन्न होकर राधा-कृष्ण उन्हें नित अपने दर्शन देते थे । स्वामी हरिदास जी एक दिन प्रिया-प्रीतम से उनके साथ रहने की इच्छा प्रकट करते हैं। राधा रानी और कृष्ण, हरिदास जी यह अभिलाषा पूर्ण करते हैं, दो विगृह निधिवन में प्रकट हो जाते  हैं। 

स्वामीजी प्रतिदिन निधिवन में भक्तिभाव से उन दोनों विग्रहों की सेवा किया करते थे। कुछ दिनों बाद, स्वामी हरिदास श्री राधा रानी और भगवान कृष्ण के सामने अपनी समस्या प्रकट करते हैं और कहते हैं - हे प्रिया प्रीतम सरकार "मैं तो इस वन में अकेला रहता हूँ, कई कई दिनों मैं भक्ति भाव में डूबा रहता हूँ, ना मुझे खाने का होश रहता ना इस वन से बहार निकलने का, इस स्थिति में - मैं आपकी और राधा जू के वस्त्रों, आभूषणों, प्रसाद आदि की अलग-अलग सेवा कैसे कर पाऊंगा। स्वामी जी की व्यथा सुनके बाद राधा रानी और श्रीकृष्ण मुस्कुराते हैं, दोनों के अंतर्ध्यान होने के साथ ही उन दोनों अलग-अलग विग्रहों का एकाकार हो जाता हैं। इस प्रकार बांके बिहारी जो राधा और कृष्ण की संयुक्त मूर्ति प्रकट होती हैं। धारणाओं के अनुसार, यह दिन मार्गशीष मास की पंचमी तिथि थी।














बांके बिहारी मंदिर की स्थापना कब और कैसे हुई ?

आरंभ में बांके बिहारी का विगृह निधिवन के प्रवेश द्वार के पास ही एक छोटे से मंदिर में प्राण प्रतिष्ठित किया गया था। आपके मन में प्रश्न बन रहा होगा जब बांके बिहारी की मूर्ति निधिवन में प्रकट हुई वही प्राण प्रतिष्ठित थी तो आज यह बांके बिहारी मंदिर में कैसे पहुंची ? बांके बिहारी जी की सेवा का उत्तरदायित्व स्वयं स्वामी हरिदास जी अपने छोटे भाई गोस्वामी जगन्नाथ को सौंपते हैं। आजतक गोस्वामी जगन्नाथ जी के वंशजों द्वारा बिहारी जी की सेवा की ज़िम्मेदारी निभाई जा रही हैं। 19 वीं सदी के मध्य भाग में गोस्वामियों द्वारा बांके बिहारी मंदिर को बनाने का प्रयास किया जाता हैं। जिसके परिणामस्वरूप 3600 वर्ग फीट के कुल क्षेत्रफल में मंदिर 1862 ईस्वी में बनकर तैयार होता हैं, जिसमें 1200 वर्ग फीट सिर्फ और सिर्फ भक्तों के दर्शन के लिए निर्धारित हैं।


70 हज़ार की लागत से निर्माण हुए बांके बिहारी के मंदिर को बनाने में भरतपुर के राजा रतन सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मूलतः वर्तमान मंदिर के स्थान पर यहां भरतपुर के राजा रतन सिंह का हास-परिहास के लिए बाग़ बगीचे हुआ करता था। इस बगीचे में चार कुँए हुआ करते थे जिसके कुछ अवशेष आज भी मिल जायेगें। लगभग 13 वर्षों में बनकर तैयार हुए बांके बिहारी जी के मंदिर को बनाने के लिए करौली की काकाकिया ईंट,भरतपुर का चूना और राजस्थान के लाल पत्थर का उपयोग हुआ हैं। लाल पत्थर का प्रयोग मंदिर को राजस्थानी स्थपत्या कला स्पर्श देता हैं मगर बाद के वर्षों में सफ़ेद मार्बल भी मंदिर में लगाएं गए। कुछ वर्षों से मंदिर में चांदी का भी प्रयोग हुआ हैं, ठाकुर जी के विगृह के पास चांदी का वर्क भी लगाया गया हैं। 
 

बांके बिहारी मंदिर में दर्शन करने का सही समय 

बांके बिहारी जी के दर्शन का समय गर्मियों में अलग और सर्दियों में अलग होता हैं। नीचे दिए गए शिड्यूल मे मंदिर खुलने के समय से लेकर ठाकुरजी के मंदिर में होने वाली विभिन्न आरतियों, भोग का समय दिया गया हैं साथ ही अलग अलग ऋतुओं में मंदिर के बंद होने का समय। 



 



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